किम जोंग उन, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग ने चीन की विक्ट्री डे परेड में भाग लिया, लेकिन 1989 के तियानआनमेन नरसंहार के बाद से भारत लोकतंत्र विरोधी क्लब से दूर है। जियोपॉलिटिक्स में तस्वीरें शब्दों से अधिक कहती हैं। चीन के विक् ट्री डे परेड में उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक फोटो वायरल हुई। तीनों नेताओं का एकजुट होना अमेरिका और पश्चिमी देशों को एक संदेश देना था। लेकिन भारत इस चित्र में कहीं नहीं था? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस फ्रेम से गायब थे? आप भी सोच रहे होंगे कि पीएम मोदी इस तस्वीर में क् यों नहीं हैं? इसमें पीछे की कहानी तीस छह वर्ष पुरानी है। भारत, आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में निर्णायक भूमिका निभाता है, आखिरकार इस तरह के एक ‘ऑटोरिटेरियन क्लब’ से दूर क्यों रहता है? इसका जवाब 4 जून 1989 की एक घटना से मिलता है, जिसने चीन की राजनीति और भारत-चीन रिश्तों को बदल दिया। 4 जून 1989 को: यह तारीख दुनिया के इतिहास में ब्लैक संडे के नाम से जानी जाती है क्योंकि बीजिंग में हुआ खूनी रविवार। लाखों लोग बीजिंग के तियानआनमेन स्क्वॉयर पर आए। लोकतांत्रिक सुधार उनकी एकमात्र मांग थी। छात्रों ने राजनीतिक निगरानी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाए। उनका कहना था कि चीन को सिर्फ एक पार्टी की नियंत्रण से मुक्त करके जनता को वास्तविक अधिकार मिलेंगे।
यह प्रदर्शन कई हफ्तों तक चला। चीन की युवा पीढ़ी ने टेलीविजन पर पहली बार आजादी के लिए सड़क पर उतर आया, जब छात्रों ने स्क्वॉयर पर टेंट लगा लिए और वहां गॉडेस ऑफ डेमोक्रेसी की मूर्ति खड़ी की। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे अपने शासन के लिए खतरा समझा। फिर क्या हुआ? सेना को आदेश दिया गया। जून 1989 की सुबह, टैंक और भारी हथियारों से लैस सैनिक तियानआनमेन स्क्वॉयर की ओर बढ़े। उस दिन दुनिया ने एक भयानक दृश्य देखा। निहत्थे विद्यार्थियों को मशीनगन से गोली मार दी गई। भीड़ ने टैंकों को चढ़ाया। चीन अभी भी सही आंकड़े छिपाता है, लेकिन अनुमान है कि सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों लोग मारे गए हैं। यही दिन दुनिया ने चीन को लोकतंत्र का हत्यारा बताया।
भारत ने कहा कि यह लोकतंत्र की हत्या है क्यों?
उस समय भारत ने ब्रिटिश हुकूमत से आजादी की एक लंबी लड़ाई लड़ी। इस नरसंहार को भारत ने बहुत गंभीरता से लिया। राजीव गांधी उस समय प्रधानमंत्री थे। भारत ने चीन की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की। नई दिल्ली से स्पष्ट संदेश था कि लोकतंत्र मानवीय अधिकार भी है, न सिर्फ व्यवस्था. 4 जून को चीन ने इसी अधिकार को कुचल दिया। भारत ने कई वर्षों तक चीन से उच्चस्तरीय बातचीत नहीं की। आज भी यही सिद्धांत लागू है। यही कारण है कि भारत आज भी चीन से दूर रहता है जब वह अपनी राजनीतिक शक्ति को दिखाने के लिए बड़े कार्यक्रम करता है।
क्या भारत तभी से चीन के कार्यक्रम से दूर है?
1989 के बाद भारत ने चीन के किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया, यह कहना सही नहीं होगा। दोनों देशों के बीच रणनीतिक और व्यापारिक संबंध बने रहे, लेकिन दोनों देशों में भरोसा की कमी रही। 1993 और 1996 में, भारत और चीन ने सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए समझौते किए। 2008 तक दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी बढ़ी। लेकिन 1989 की घटना भारतीय नीति-निर्माताओं के मन में हमेशा रहेगी।
भारत ने मानता रहा कि चीन की राजनीतिक व्यवस्था भारत से बिल्कुल अलग है और वहाँ जनता की आवाज कभी नहीं सुनाई जा सकती। यही कारण है कि भारत कभी भी चीन के नेतृत्व वाले स्वतंत्र ढांचे का सदस्य नहीं बनेगा।
2020 के बाद रिश्तों में तनाव और 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हुए हमले ने दोनों देशों के रिश्तों को और खराब कर दिया। तब से भारत ने चीन पर पूरी तरह से भरोसा खो दिया है। 5जी नेटवर्क से लेकर ऐप्स तक, भारत ने चीन को कई स्तरों पर रोकने की कोशिश की। यही कारण है कि भारत ने किम जोंग, पुतिन और जिनपिंग के साथ एक साथ नजर आने पर दूरी नहीं छोड़ी। क्योंकि भारत लोकतंत्र, बहुपक्षीय संतुलन और विश्वव्यापी स्थिरता को अपना लक्ष्य मानता है
क्यों भारत इस चित्र में शामिल नहीं हो सकता?
भारत डेमोक्रेसी का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यदि प्रधानमंत्री मोदी इस फ्रेम में शामिल होते, तो यह बताता कि भारत लोकतंत्र की जगह डिक्टेटरशिप में जा रहा है।
आज भारत G20, क्वाड और ब्रिक्स में मजबूत ताकत है। भारत को अमेरिका, यूरोप और जापान-ऑस्ट्रेलिया तक भरोसेमंद पार्टनर मानते हैं।
जून 1989 की घटना भारत की कूटनीतिक स्मृति में है। मोदी उस समय राजनीति में नहीं थे, लेकिन भारत की संस्थागत मानसिकता है कि लोकतंत्र विरोधी घटनाओं के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए।

